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भगवान सहस्त्रार्जुन


जिस भक्त का सर झुके ,सहस्त्रार्जुन के आगे !!
सारी दुनिया झुकती है ,उस इंसान के आगे !!

सुबह शाम भजन करले ,मुक्ति का यतन कर ले !!
छुट जायेगा जन्म-मरन ,सहस्त्रार्जुन का सुमिरन कर ले !!

चंद्रवंशी क्षत्रियों में सर्वश्रेठ "हैहयवंश" एक उच्च कुल के क्षत्रिय हैं। महाराज कार्तवीर्य पुत्र अर्जुन (सहस्रार्जुन) जी का जन्म कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रावण नक्षत्र में प्रात: काल के मुहूर्त में हुआ था। सहस्त्रार्जुन एक चंद्रवंशी राजा थे इन्ही के पूर्वज थे महिष्मन्त, जिन्होंने नर्मदा के किनारे महिष्मति (आधुनिक महेश्वर) नामक नगर बसाया। इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरांत कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को संभाला।भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे। भार्गव प्रमुख जमदग्नि ॠषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर संबंध थे। कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन थे। कृतवीर्य के पुत्र होने के कारण उन्हें कार्त्तवीर्यार्जुन भी कहा गया। कार्त्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था। भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन कहा जाने लगा। श्री कार्तवीर्यार्जुन ने दस हजार वर्षो की कठिन तपस्या के पश्चात् श्री भगवान् दत्तात्रेय से दस (10) वरदान प्राप्त किये, वे वरदान निम्न प्रकार से है:-
  1. ऐश्वर्य शक्ति प्रजा पालन के योग्य हो, किन्तु अधर्म न बन जावे।
  2. दूसरो के मन की बात जानने का ज्ञान हो।
  3. युद्ध में कोई समानता न कर सके।
  4. युद्ध के समय सस्त्र भुजाएं प्राप्त हो, उनका तनिक भी भार न लगे।
  5. पर्वत, आकाश, जल, पृथ्वी और पाताल में अव्याहत गति हो।
  6. मेरी मृत्यु अधिक श्रेष्ठ के हाथो से हो।
  7. कुमार्ग में प्रवृत्ति होने पर सन्मार्ग का उपदेश प्राप्त हो।
  8. श्रेष्ठ अतिथि नी निरंतर प्राप्ति होती रहे।
  9. निरंतर दान से धन न घटे।
  10. स्मरण मात्र से धन का आभाव दूर हो जाये एवं भक्ति बनी रहे।
इसप्रकार त्रेतायुग में महिष्मती के संस्थापक चन्द्रवंशी सम्राट महिष्मान की चौथी पीढ़ी में कृतवीर्य हुए थे, उनके पुत्र का नाम अर्जुन था और हैहयवंश की दसवीं पीढ़ी में कर्त्तवीर्याजुन हुए । रामायण,महाभारत,वायुपुराण ,मत्स्यपुराण ,देवीभागवत ,आदि पौराणिक ग्रंथों में उनके विषय में उत्कृष्ट उल्लेख पाये जाते हैं। भारत में सात चक्रवर्ती राजा हुए जिनमें सहस्त्रार्जुन एक थे। वह एक महान राजा थे | उन्होंने एक हजार अश्वमेघ् यज्ञ किये थे। उनकी यज्ञ वेदियां ठोस सोने की बनाई जाती थी जिन्हें वे आचार्य व ब्राम्हणों को भेंट कर देते थे। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र ने हैहयवंशीय कर्त्तवीर्याजुन के रूप में जन्म लिया। भविष्य पुराण के अनुसार महाराज कार्त्तवीर्य ने इस पृथ्वी पर पचासी हजार वर्ष तक अखंड शासन किया। महाराज सहस्त्रबाहु कृतिम वर्षा के प्रथम जनक ( आविष्कारकर्ता) थे। अतः ' प्रत्यक्ष परजन्य ' कहलाते हैं। इन्होंने लंकापति रावण को कैद करके अपनी घुड़साल में बाँध दिया था। रावण को सहस्त्रबाहु जी ने महेश्वर में सहज ही बंदी बना लिया था।

जानऊ में तुम्हार प्रभुताई, सहस्त्रबाहु सन परी लराई ।
समर बलि सन करि जस पावा, सुनि कपि वचन विहसि विहरावा।