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आइका क्या है / What is AIKKKA?


"ऑल इंडिया कलवार कलाल कलार एसोसिएशन" जिसे हम सभी संक्षेप में या प्यार से "आइका" कहते हैं। सबसे पहले यह जानना जरुरी है की यह संगठन यानि “आइका” है क्या??? यह तो हम सभी जानते हैं कि हमारी मूल जाति "कलवार, कलाल या कलार" है। वास्तव में इन तीनो शब्दों कि आत्मा एक ही है किन्तु स्थान विशेष या बोली-भाषा में बदलाव के कारण ही अलग-अलग प्रतीत होते हैं। यह भी एक सच्चाई है कि हम हैहय वंशीय क्षत्रिय हैं और हिंदुस्तान पर सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले कलचुरी राजवंश के वंशज हैं। विभिन्न स्थानीय कारणों और जीविकोपार्जन हेतु सैकड़ो वर्ष पहले समाज कई हिस्सों में विभक्त हो गया । और हमारी मूल जाति बिखर कर कई उपजाति में बंट गई। कलवार में जायसवाल, ब्याहुत, खरीदाहा, सुढ़ी .... बने तो कलाल में मेवाड़ा, टांक, बेगड़ा, पुरबिया, सुवालका .....आदि बने इसी तरह कलार में भी कोसरे, झरिया, मराठा, जैन कलार ..... आदि बन गए। इन परिस्थितियों में मुख्य रूप से चार विचारधारा चर्चा में आई और इसके अनुरूप संगठन बनते चले गये-
  1. वंश आधारित संगठन
  2. उपनाम आधारित संगठन
  3. उपजाति आधारित संगठन
  4. मूल जाति आधारित संगठन
हैहय वंशीय, कलचुरी राजवंशीय, उपनाम या उपजाति आधारित संगठन समाज को एकजुट करने में बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाए क्यों कि हैहय या कलचुरी वंश में और भी कई जातियां जैसे लोहार, ताम्रकार, कसेरा, ठठेरा ....आदि भी आती हैं इसलिए हैहय या कलचुरी राजवंश पर कलवारों का एकाधिकार नहीं बनता है। इसी तरह ब्याहुत, जयसवाल, मेवाड़ा, टांक आदि अपने आप में कलवार, कलाल, कलार की एक उपजाति है इसलिए उपनाम से चलने वाले समवर्गीय या सर्ववर्गीय संगठन कलवारों के अन्य वर्ग/ उपवर्ग को अपने में जोड़ने में सफल नहीं हो पाये। इसी को ध्यान में रखकर व्हाट्सएप्प जैसे सोशल मीडिया के जरिये बहुत से संगठन के पदाधिकारियों को जोड़कर ग्रुप के माध्यम से लगभग 7-8 महीने के विचार-विमर्श के पश्चात मूलजाति आधारित राष्ट्रीय संगठन बनाने का निर्णय हुआ, और "ऑल इंडिया कलवार एसोसिएशन" का गठन हुआ। बहुत से बुद्धिजीवियों का सुझाव आया कि कलवार के साथ साथ कलाल और कलार भी जोड़ दिया जाय ताकि हर प्रदेश में रहने वाले स्वजातीय बंधु इससे जुड़ सकें। इसलिए संगठन का नाम "ऑल इंडिया कलवार कलाल कलार एसोसिएशन" (आइका/ AIKKKA) कर दिया गया। जिसका विधिवत गठन देश भर से आये कई संगठन के पदाधिकारी, बुद्धिजीवी, सामाजिक चिंतक और विशाल स्वजातीय समूह की उपस्थिति में 21 फ़रवरी 2016 को दिल्ली स्थित सनातन धर्म मंदिर में किया गया, और वर्ष 2016 में ही इसका पंजीकरण भी प्राप्त हो चुका है। अनादि काल से ही किसी भी राष्ट्र और समाज की पहचान उसके झंडे से होती चली आ रही है। महाभारत युद्ध के समय भी योद्धाओं की पहचान पताका (झंडे) से ही होती थी। इसी को ध्यान में रखकर सैंकड़ों उपनामों, उपजातियों और उपवर्गों में बँट चुके कलवार, कलाल व कलार समाज को संगठित और इसकी प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने हेतु 18-19 दिसम्बर, 2016 को सिल्लीगुड़ी में संपन्न “अंतरराष्ट्रीय कलवार सम्मलेन” में समाज के झंडा का लोकार्पण किया गया। विभिन्न बुद्धिजीवियों, विचारक व समाजसेवी द्वारा झंडा के प्रारूप को तय करने में “उद्गम, कुलदेवता, विचारधारा व उज्जवल भविष्य की परिकल्पना" को ध्यान में रखा गया है। "आइका" अपने मूल मंत्र "एक झंडा, एक गान; अपनी एक राष्ट्रीय पहचान" को आत्मसात कर अपने मुख्य उद्देश्य 556 या इससे भी अधिक उपनामों में विभक्त हो चुके समाज को एकजुट कर इसकी खोयी प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना चाहती है। देश भर में कार्यरत कई संगठनो ने “आइका” की नीतियों से प्रभावित होकर अपना पूर्ण समर्थन दिया है और आइका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस नवनिर्माण में शामिल हो चुके हैं। आइये!!!!!!!!!! कुलदेवताद्वय की इस ज्योत को हम हर घर और हर स्वजातीय बंधु तक पहुचायें और अपना भविष्य उज्जवल करें।

आईका का उद्देश्य / Purpose of AIKKKA


  • समाज के चारित्रिक , मानसिक ,बौद्धिक , विकास कार्य करना तदानुरूप आदर्श समाज के निर्माण हेतु मानव सेवा के लिए कार्य करना .
  • प्रेम बंधुता एवं भाईचारा की भावना जागृत करना .
  • समाज के शिक्षा एवं आदर्श विवाह हेतु प्रयास करना .
  • समाज के कम आयु की बिधवा एवं परित्यक्ता युवतियों को पुनः विवाह के लिए प्रोत्साहित करना.
  • समाज को एकता के सुत्र में पिरोने और गौरवशाली इतिहास से सीख लेते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का संकल्प लेना .
  • गौरवमयी इतिहास और संस्कारों को याद रखने के लिए प्रेरित करना.
  • आज के बच्चों में पाश्चात्य संस्कृति भरने के बजाय उनमे विरासत में मिली सामाजिक एकता को बरकरार रखने का जज्बा भरना .